बीकानेर, 15 मार्च। “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” अर्थात् पूरे विश्व से कल्याणकारी और शुभ विचार आएं—इसी भाव के साथ राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, बीकानेर द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) सम्मेलन का समापन सत्र रविवार को आयोजित हुआ।
‘पांडुलिपियों एवं ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने में एआई के उपयोग और चुनौतियां’ विषय पर आयोजित इस सम्मेलन का आयोजन भाषिणी तथा ज्ञान भारतम् के सहयोग से किया गया, जिसमें देश-विदेश के अनेक विशेषज्ञों ने भाग लिया।
कोटा कृषि विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. विमला डुकवाल ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में कहा कि भारत की विरासत के संरक्षण और पांडुलिपियों की खोज में एआई का उपयोग एक महत्वपूर्ण और गुणकारी प्रयास है। विशिष्ट अतिथि लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिन्हा, निदेशक एशियाटिक सोसायटी कोलकाता ने ‘एआई विद्वनिका’ सॉफ्टवेयर की जानकारी दी, जिसका उपयोग प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों के अनुवाद में किया जा रहा है।
मुख्य वक्ता ज्ञान भारतम्, दिल्ली के निदेशक प्रो. अनिर्बाण दास ने कहा कि ज्ञान भारतम् अभियान के अंतर्गत पांडुलिपियों के पठन-पाठन के लिए एआई मॉडल विकसित करने हेतु भाषा विशेषज्ञों की महती आवश्यकता है।
सम्मेलन में विभिन्न विशेषज्ञों ने अपने शोध और अनुभव साझा किए। आईआईटी रुड़की के डॉ. स्पर्श मित्तल ने बताया कि मशीन लर्निंग के माध्यम से मोडी लिपि के विश्लेषण और लिप्यंतरण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। वहीं आयुष मंत्रालय, दिल्ली के नमन गोयल ने “Ayush Grid” और “Yoga Saarthi” चैटबॉट जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एआई आधारित “Yoga Pose Detector” तकनीक से योग अभ्यासों की पहचान कर लगभग 90 प्रतिशत तक सटीक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
आईआईटी मंडी के डॉ. रोहित सलूजा ने प्राचीन पांडुलिपियों से पाठ निष्कर्षण पर अपने शोध प्रस्तुत किए और एआई आधारित तकनीकों का डेमो दिया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रो. शानदार अहमद ने अनुसंधान और वैज्ञानिक खोजों में एआई की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसके माध्यम से जटिल संरचनाओं और प्रोटीन विश्लेषण जैसे कार्य संभव हो पाए हैं।
आईआईटी-बीएचयू की डॉ. विनिता चंद्रा ने सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए नैतिक एआई के विकास और उपयोग से जुड़े दिशा-निर्देशों पर विचार रखे। वहीं आईआईएच, दिल्ली की महक सेजवाल ने पांडुलिपियों में मौजूद चित्रों और पाठ से एआई की सहायता से जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया पर व्याख्यान दिया। आईजीएनसीए, दिल्ली के डॉ. मंगल देव आचार्य ने भारतीय संस्कृति और ग्रंथों के संरक्षण में एआई की संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
प्रज्ञशील गौतम ने शोध कार्यों में एआई टूल्स के उपयोग पर चर्चा करते हुए बताया कि एआई की मदद से व्याकरण जांच, साईटेशन और संदर्भ प्रबंधन जैसे कार्य सरल हो सकते हैं, हालांकि इसके उपयोग से जुड़ी चुनौतियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
सम्मेलन के अंत में आयोजित पैनल चर्चा में प्रो. अनिर्बाण दास, सतनाम सिंह तथा डॉ. नितिन गोयल ने भाग लिया, जबकि संचालन जेएनयू की प्रो. संदेशा रायपा गब्र्याल ने किया। पैनल ने निष्कर्ष निकाला कि देशभर में पांडुलिपियों और प्राचीन लिपियों के संरक्षण में एआई के उपयोग के लिए चल रहे प्रयासों को एक मंच पर लाकर राज्य स्तरीय भाषाई एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया जाना चाहिए।
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल ने कहा कि राजस्थान की बोलियां जैसे मेवाती, मेवाड़ी और ढूंढाड़ी को विलुप्त होने से बचाने के लिए छात्रों को इनके अध्ययन के लिए प्रेरित करना आवश्यक है तथा इन बोलियों को एआई में भी शामिल किया जाना चाहिए।
सम्मेलन में आर.एन. ग्लोबल विश्वविद्यालय, बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय, वेबसोल तथा एमजीएसयू के छात्र-छात्राओं ने भी भाग लिया। विद्यार्थियों के लिए प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें छात्रों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की।
कार्यक्रम में डॉ. नरेश गोयल, डॉ. वेद अग्रवाल, राजेंद्र कुमार, जयदीप दोगने, अमित जांगिड़, लक्ष्मीनारायण जोशी, भैरों सिंह राजपुरोहित, कीर्तिमान लोढ़ा, डॉ. दिग्विजय सिंह, पूरनचंद आखेचा, डॉ. पूजा मोहता, भरत जाजड़ा, डॉ. मोहम्मद फारूक, सुखाराम और महेंद्र जैन सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन गोपाल जोशी ने किया। समापन पर सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया तथा डॉ. नितिन गोयल ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
