


विभाजन-विभीषिका मनुष्य की पीड़ा, विस्थापन, संघर्ष व जीवट की मार्मिक कहानी
बीकानेर, 13 अगस्त। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी तथा इन्टेक बीकानेर के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को ‘हर घर तिरंगा अभियान’ के अंतर्गत ‘विभाजन-विभीषिका’ विषयक राजस्थानी संगोष्ठी का रोटरी क्लब सभागार में आयोजन किया गया।
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि राजेश चूरा ने कहा कि विभाजन-विभीषिका मनुष्य की पीड़ा, विस्थापन, संघर्ष व जीवट की ऐसी मार्मिक कहानी है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। विस्थापित लोगों ने भारत आकर ‘शरणार्थी’ नहीं ‘पुरुषार्थी’ बनकर देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों को सशक्त किया। कार्यक्रम अध्यक्ष मनमोहन कल्याणी ने कहा कि उस समय कहीं स्वतंत्रता के उल्लास भरे गीत गूंज रहे थे, तो कहीं लोग अपने ही देश में शरणार्थी बनकर जीवन की नई शुरुआत करने को विवश थे। डाॅ. नंदलाल वर्मा ने विस्थापितों की जिजीविषा को अत्यन्त प्रेरणास्पद बताया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए इन्टेक बीकानेर के कन्वीनर पृथ्वीराज रतनू ने कहा कि विभाजन की एक रेखा खींची गई और देखते ही देखते असंख्य लोगों के गांव, शहर, खेत, दुकानें, मंदिर, मस्जिदें, गुरुद्वारे, पड़ोसी और स्मृतियां दूसरे देश का हिस्सा बन गए। मुख्य वक्ता संग्रामसिंह सोढ़ा ने कहा कि विभाजन से केवल भूमि का ही विभाजन नहीं होता, अपितु विस्थापितों की भाषा, पहनावा, सम्बन्ध, लोकगीत, परम्पराएं सब पीछे छूट जाती हैं। उन्होंने विस्थापन की पीड़ा को दर्शाती हुई अपनी राजस्थानी कविता भी प्रस्तुत की।
अकादमी सचिव शरद केवलिया ने कहा कि विभाजन विभीषिका को समझने में साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इतिहास हमें तिथियां, घटनाएं और आंकड़े देता है, लेकिन साहित्य हमें उस समय के मनुष्य के भीतर ले जाता है। भाषा और साहित्य उन स्मृतियों के प्रहरी हैं, जिन्हें समय मिटा नहीं सकता। डाॅ. नमामीशंकर आचार्य ने वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. मदन केवलिया की आत्मकथा ‘सिंध दरियाव सूं रेत रै समन्दर तांई‘ पर व्याख्यान देते हुए कहा कि यह आत्मकथा राजस्थानी की आरंभिक आत्मकथाओं में से है। डाॅ. केवलिया ने विभाजन की इस असहनीय पीड़ा को स्वयं झेला था, इसलिए उन्होंने उस भयावह दर्द को अत्यंत मार्मिकता से अभिव्यक्त किया। डाॅ. गौरीशंकर प्रजापत ने कहा कि विभाजन के समय करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़कर पलायन करना पड़ा। यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक विस्थापनों में से एक था। सुधा आचार्य ने कहा कि नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि स्वतंत्रता कितने संघर्ष और कितनी कीमत के बाद प्राप्त हुई और देश की एकता कितनी मूल्यवान है। डाॅ. कृष्णलाल बिश्नोई ने बताया कि विभाजन के दौरान हुई अमानवीय अत्याचार की घटनाओं ने मानवता को झकझोर दिया। रोटरी क्लब अध्यक्ष प्रवीण गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसी त्रासदी फिर कभी मानवता को न झेलनी पड़े, इसके लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
इस अवसर पर घनश्याम कोठारी, अमर सिंह खंगारोत, आवड़ दान चारण, एम.एल. जांगिड़, भंवर सिंह, सुरेश व्यास, डाॅ. ललित कुमार वर्मा, रामगोपाल मारू आदि उपस्थित थे।
